BALUCHARI DESIGN

New Design concepts for INDIAN CARPETS
भारतीय कालीन डिजाईन हेतु एक सशक्त अवधारणा
बालूचरी
एतिहासिक पृष्ठभूमि :
बुनाई की विशिष्ट परम्परा के कारण यह अन्य वस्त्रों से बिलकुल अलग दिखाई पडती है। वर्तमान में प-बंगाल में मुर्शिदाबाद जिला के जियागंज गॉंव जिसका प्राचीन नाम बालूचर था । 1704 में नवाब मुर्शिदकुली खान ने ढ़ाका से मुर्शिदाबाद राजधानी बदली। जो क्रमशः कला व संस्कृति का केन्द्र बना। गंगा के दूसरे पार बसा छोटा सा गॉंव बालूचर अपने प्राक्तिक सौन्दर्य के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बना रहा एतिहासिक सूत्रों से पता चलता है कि 16 वीं श. में बंगाल के राजा प्रतापादित्य के दमन हेतु मानसिंह बंगाल गये तो उनकी निगाह इस छोटे से सुन्दर गांव पर भी पडी । बालूचरी (वस्त्र का विकास कब हुआ कहना मुश्किल है परंतु हॉं सातवीं शताब्दी ई0 में मुर्शिदाबाद, जो कर्णसुवर्ण के नाम से अपने रेशमी वस्त्रों के लिए जाना जाता था। इन वस्त्रों में विशेषतौर पर मानवाकृतियां जीवजंतुओं का समावेश लम्बे समय से होता रहा। मध्यकालीन साहित्य में एसे अनेको प्रसंग है जिसमे इस प्रकार की आकृतियों की प्रयोग पुष्टि है। बंगाल के अनेको लोक शिल्प जैसे कांथा,पकी मिट्टी के अलंकरण साथ साथ मुर्शिदाबाद में प्रचलित लघुचित्रों की शैली का प्रभाव बालूचर पर पड़ा । मुर्शिदाबाद के रेशम के व्यापार से फ्रांसीसी, अंग्रेज, अरबी, के अलावा गुजरात व मारवाड़ के व्यवसायी भी जुडे़ थे। एसा अनुमान लगाते है कि गुजरात व मारवाड़ के व्यापारियों के माध्यम से अलंकरण व ब्रोकेड शैली का प्रचलन बालूचर में हुआ। बंगालमें बालूचरी बिनाई के लिए : बहादुरपुर, मीरपुर, अभयपाड़ा, रंगनापाड़ा, रामदह, बलिग्राम बेलिया पोखर, रनसागर, कालिग्राम मिर्जापुर प्रमुख केंद्रो के रूप में जाने जाते थे । बालूचर के वस्त्र उद्योगो में रेशमी साडियों का स्थान सर्व प्रमुख था। इसके साथ साथ रेशमी रूमाल, चौकोरा, गलाबंद इत्यादि भी यूरोप र्नियात के लिए बिने जाते थे। फ्रांस के सम्राट लुई 14 को बालूचरी रूमालों का विशेष शौक रहा।

बुनाई की बालूचरी प्रथा
बालूचरी वस्त्रों में ताने व बाने मजबूत बंटे हुए रेशम के होते थे परंतु अलंकरण बिना बंटे मोटे रेशम के द्वारा बनाए जाते थे। इसके फल स्वरूप बिनाई में एक प्रकार का मोटापन आता था और अलंकरण सुस्पष्ट निखरते थे। विरोधी रंगो का प्रयोग बालूचरी में विशेष रूप से दिखाई देता है, जैसे – लाल काला,पीला बैंगनी इस प्रकार के रंगो का प्रयोग हुआ। बालूचरी साड़ियों में पल्ले (आंचल) की बहुत ही विस्त्त रूप से बिनते थे। 1880 के आस पास टेक्सटाइल सर्वे में दुबराज नामक एक ही व्यक्ति एैसा था जो कि विशेष रूप से बालूचरी वस्त्रों की बुनाई में माहिर था । बालूचरी वस्त्रों की बुनाई हिन्दू व मुस्लिम दोनो ही वर्ग के लोग करते थे। साड़ी की जमीन गाढे़ लाल, मैरून, बैंगनी, ब्राउन व नीले रंग की होती थी, जिस पर सफेद, पीले नीले, हरे, बैंगनी रंगो से अलंकरण बनाए जाते थे। समकालीन इतिहास के बदलते हुए काल परिवेष को बालूचरी के कारीगरों ने बालूचरी में संजीवित रखा 1757 के पलासी युद्ध के पश्चात कुछ एसे अलंकरण बिने गए जिसमें सैनिको, सिपाहियों को देखते है। कलंगा (कैरी का प्रयोग निष्चित तौर पर मुगल रहा, इसका प्रयोग साड़ी के बीच में बडी ही खूबसूरती से किया गया। बालूचर साड़ियों में बड़े-बड़े फूलदार मोटिफ होते हैं जो कि लतेदार फूलपत्तियों से सुसज्जित होते है। पारम्परिक रूपसे मुस्लिम समुदाय को भी उनके द्वारा न्यायलयीय दृश्यों वाले, घोड़े पर सवार घुड़सवार, हुक्का पीती औरतों के दृश्यांकन वाले बालूचरी के उत्पादन के लिए जाना जाता रहा। कलंगा डिजाइन या शंक्वाकार मोटिफ प्रायः फूलदार किनारों से घिरे होते थे।
आज भारत सरकार इस अद्भुत सुन्दर कला के पुनर्जागरण के लिए प्रयास कर रही है ताकि प्रकृतिदत्त इस कला के अस्तित्व को बचाये रखा जा सके। यह कार्य बुनाई सेवा केन्द्रों एवं हथकरघा निदेशालयों के सहयोग से किया जा रहा है।

सुन्दरता
बुनाई की बालूचरी प्रथा अपने उत्कृष्टता के शिखर पर नवाब मुर्शिद कुली खान के शासन के दौरान पहुची जिसने इस कला को भरपूर संरक्षण प्रदान किया। बालूचरी की मुख्य पहचान किनारों एवं पल्लूओं को शोभित करने हेतु मानवीय ब्रोकेडे चित्रों का प्रयोग किया जाना है। जिनमे बीच में कलंगो का संयोजन होता था,तथा चौकोर हिस्से में आक्तियां, पशुपक्षी बिनते थे । कुछ आक्तियां विशेषरूप से आकर्षक है, अंग्रेज साहब मेम साहब, नवाब बेगमों को बिना गया है यही नही कुछ अलंकरणों में रेल के डब्बे और स्टीमर का भी प्रयोग है। इस दौर में बालूचरी कला में हाथी के पीठ के ऊपर बैठे राजा एवं भद्र पुरूष, सुन्दर अवस्थाआ में बैठे लड़कियों के चित्रांकनों वाली डिजाइन प्रचलित हुआ करती थी। मोटिफ्स सम्पूर्णतः सिल्वर जऱी की हुआ करती थी एवं कपड़े मंहगे हुआ करते थे। चूंकि सदी के शुरूआत में अन्तिम कुशल बुनकर दुबराज, अपनी इस कला को बिना किसी व्यक्ति को सिखाये ही दिवंगत हो गये, अतएव इस गौरवमयी प्रथा का अंत उनके साथ ही हो गया। पुनः इस कला के पुनरूत्थान हेतु विभिन्न स्कीमों की शुरूआत की गई। आज प्रायः समाप्त यह कला बांकुरा जिले के बिश्नुपुर में सिखायी जा रही है, जहॉ पूर्ण रूपसे बालूचरी स्टाईल वर्तमान रेशमी बुनाई प्रथा को प्रभावित कर रही है। बिष्णुपुर का आकर्षक नक्काशीपूर्ण टेराकोटा मंदिर इन बुनकरों को अत्यधिक प्रेरणा देता है जो कि सम्पूर्ण महाकाव्य को साड़ी के पल्लू पर उभार देते हैं। इनके जमीनी रंग, मल्बरी सिल्क पर आकर्षक किनारों में सुन्दर बेज से लेकर शाही नीले और लाल आदि में होते हैं। अपितु आज बालूचरी पूर्व के भॉति अपने शिखर पर नहीं है, तथापि इसमें एक विचित्र अपील है, जो कि इसे, पहनने वाले को भीड़ में एक अलग पहचान देता है। बालूचरी बंगाली स्कीम की रेशम हेतु प्राथमिकता में एक अपवाद है। अन्य सभी मलबरी न होकर प्रायः मटका या टसर होते हैं। अन्य मुर्शिदाबादी सिल्क वेजिटेबल एवं सिन्थेटिक रंगो से हाथ के द्वारा छापे जाते हैं और बहुत ही उचित मूल्य के होते हैं।

कालीन डिजाईन के परिप्रेक्ष्य में बालूचरी डिजाइन
बालूचरी की डिजाइनों मे भारतीय कालीन के लिए अपार संभावनाए है, क्यों कि इसकी डिजाईन के पैटर्न व मोटिफ के सभी तत्वो में वह बात है जिसके कारण भारतीय कालीन क्षेत्र में एक ब्रांड के रूप में यह नई संभावनाओ के द्वार खोल सकता हैं। विश्व के किसी भी देश की डिजाईन की तुलना में इसके जोड़ का कोई नही। इसकी डिजाईन में एक प्रकार का का नयापन है जिस पर गंभीरता से विचार (कार्य करने की आवश्यकता है। भारतीय कालीन प्रौद्योगिकी संस्थान के डिजाईन प्रयोगशाला में इस पर कार्य किया गया है। कार्यालय विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) द्वारा भारतीय कालीन डिजाईन के विकास हेतु अनेक परियोजनाओं द्वारा काफी कार्य किया गया है। अब उद्योग द्वारा इस क्षेत्र में चेतनता की आपेक्षा है।

लेखक चंद्र शेखर वाजपेयी, प्रभारी डिजाईन भारतीय कालीन प्रौद्योगिकी संस्थान,भदोही